हज़रत उमर फारूक (र.अ) इस्लाम के दूसरे खलीफा थे।
आपका नाम सुनते ही इंसाफ और इमानदारी की मिसाल याद आती है।
आप रातों को भेष बदलकर मदीना की गलियों में घूमा करते थे ताकि पता लगा सकें कि आपकी
रियासत में कोई भूखा तो नहीं
सो रहा।
हज़रत उमर अपने गुलाम असलम के साथ गश्त पर थे। बहुत ठंड थी। चलते-चलते उन्होंने देखा कि
दूर एक झोपड़ी में रोशनी जल रही है और छोटे-छोटे बच्चों के रोने की आवाज आ रही है।
आप उस झोपड़ी के पास गए। अंदर देखा तो एक बूढ़ी औरत चूल्हे पर हांडी चढ़ाए बैठी है और उसके चारों ओर 3 बच्चे भूख
से रो रहे हैं। औरत हांडी को चम्मच से हिला रही है और बच्चों को बोल रही है - "बेटा थोड़ा सब्र
करो, खाना बन रहा है।"
औरत ने कहा - "ए मुसाफिर तू अपना रास्ता ले। उमर को क्या परवाह है कि उसकी रियासत में गरीब भूखे मर रहे हैं। दो दिन
से घर में कुछ नहीं है। मैंने हांडी में पानी और पत्थर डाले हैं ताकि बच्चे समझें खाना बन रहा है
और रोते-रोते सो जाएं।"
ये सुनकर हज़रत उमर की आंखों में आंसू आ गए। आपका दिल कांप उठा।
आप तुरंत वहां से बैत-उल-माल (सरकारी खजाना) की तरफ भागे। असलम कहते हैं कि मैंने उमर को इतना तेज़ कभी भागते
नहीं देखा।
आपने वहां जाकर एक बोरी में आटा, घी, खजूर, शहद और गोश्त भरा। बोरी बहुत भारी थी। असलम ने कहा -
"अमीर-उल-मोमिनीन, ये बोरी मुझे दे दीजिए मैं उठा लेता हूं।"
क्या क़यामत के दिन मेरा गुनाहों का बोझ भी तुम उठाओगे? ये बोझ मुझे ही उठाना पड़ेगा।
"
आप वो भारी बोरी अपने कंधे पर उठाकर उस झोपड़ी तक लाए। आपने अपने हाथों से आटा गूंथा, खुद आग जलाई और बच्चों के
लिए दलिया बनाया। अपने हाथों से फूंक मार-मार कर आग जलाते रहे, धुएं से आपकी दाढ़ी भर गई।
जब खाना बन गया तो आपने बच्चों को अपने हाथ से खिलाया। बच्चों ने पेट भर कर खाया और फिर खुश होकर खेलने लगे।
अल्लाह तुझे इसका बदला दे। खलीफा तो तुझे होना चाहिए था, उमर को नहीं।"
तब असलम ने कहा - "अम्मा, जिन्हें तुम दुआ दे रही हो, यही अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत उमर हैं।"
ये सुनते ही औरत डर गई और माफी मांगने लगी। लेकिन हज़रत उमर ने कहा - "अम्मा डरो मत। कल सुबह मेरे पास दरबार में
आना।"
तो हज़रत उमर ने उसके लिए महीने का राशन, कपड़े और रहने का इंतज़ाम कर दिया।
और उस रात आप सारी रात रो-रो कर अल्लाह से माफी मांगते रहे कि मेरी वजह से एक गरीब भूखी रही।
1. हुक्मरान को अपनी जनता का ख्याल रखना चाहिए।
2. गरीबों और भूखों की मदद करना सबसे बड़ा इबादत है।
3. इंसाफ हमेशा बराबर होना चाहिए, चाहे सामने अपना बेटा ही क्यों न हो।
4. अल्लाह से डरने वाला इंसान कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं कर सकता।